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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



शोषण


मोती प्रसाद साहू


 
एक बड़े छायादार
वृहदाकार
पेड़ के समीप
खड़ा दुबला- पतला
सीधा-सा
डरा सा
या यों कहें कि
भूख से जुदा- सा
दिखने वाला पेड़
कुछ नहीं कहता?
बहुत कुछ कहता है
वह कहता है कि
इस बड़े ने
अपने साम्राज्य विस्तार के लिये
छीना है
हमारे हिस्से का आकाश
प्रकाश
पाताल
हवा और पानी
मेरी जवानी
फिर भी मेरे पास
नहीं कोई सबूत
इसके खिलाफ
यह सिद्ध करने के लिये कि
इसने किया है मेरा 
शोषण।
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