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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



दुखिया


मोती प्रसाद साहू


 
फिर चिल्लाया है दुखिया ने
घर छीना मेरा मुखिया ने।
सुनकर भी हलचल नहीं होती
ध्वनि ‘पागल ‘मुखरित होती।।  

आये दिन जाता है थाने 
नहीं रहे अब इसके माने।
मुखिया थाने में हॅसता है
दुखिया को ’डॅसकर’ डॅसता है।।  

उसकी चिल्लाहट बस इतनी
विषधर मुख में दादुर जितनी।
उदरस्थ होना बस बाकी
बैठी देख रही है खाकी।।

सुना है ’दुखिया’ बन गया योगी
गेरु ओढ़ चला ज्यों रोगी।
खझड़ी बजाकर गाता गीत
नहीं है दुनिया में कोई मीत।।

घर- द्वार बाधक हैं बंदे!
लोभ-लालसा यह सब गंदे।
ईश -भजन केवल संग जाता
शेष-अशेष यहीं रह जाता।।
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