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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



मातृभूमि की यही कहानी


कुलदीप पाण्डेय आजाद


 
नित नव पल्लव सूख रहे हैं,
स्वप्न हृदय के टूट रहे हैं |
उपवन कैसे अस्त-व्यस्त है,
नहीं नजर आता रँग धानी |
मातृभूमि की यही कहानी |
आजादी के अंकुर फूटे,
सत्य मार्ग से रिश्ते टूटे |
भ्रष्टाचार,कुरीति फली है,
बढ़ती दिन-दिन है हैवानी |
मातृभूमि की यही कहानी |
प्रहरी कैसे लुप्त हो गए,
पुष्प खिले वे कहाँ खो गए |
उनको खिला सके न कोई,
नहीं सरों में इतना पानी |
मातृभूमि की यही कहानी |
याद मनुज माली को करता,
पीर अगाध हृदय में भरता |
कोई ऐसा नहीं बचा जो,
लिखे देश की नयी कहानी |
मातृभूमि की यही कहानी |		 
 
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