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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



गुंजन के फूल


-डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


 

      ध्वनि के बिंतानों में 
      गुंजन के फूल,
      ध्वनि के समुद्रों में
      गीत रहे झूल।

            कौव्वे की कांव कांव
            कोयल की कुहक,
            झुलाता पवन पर्ण
            फूलों की महक।

      खुशियां अस्तित्व की
      इन सबका मूल,
      ध्वनि के समुद्रों में
      गीत रहे झूल।

            तोतों की टेंटे तो
            चिड़ियों की चहक,
            वर्षा से झरनों के 
            स्वर रहे बहक।

      वर्षा की पहली चोट
      उड़ाती है धूल,
      ध्वनि के बितानों में
      गुंजन के फूल।
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