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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



आहत मन


डॉ० अनिल चड्डा


 
आहत मन
कहता है हर क्षण
कैसे सुलझे
उर की उलझन
तुम बिन
मुरझाया कोमल तन
बना मरूस्थल
जीवन प्रांगण
अँखियाँ देखें
एक ही सपन
कैसे खिले
उजड़ा चमन
हारी मैं
ताने-बाने बुन
शायद लो तुम
व्यथा मेरी सुन
तुम बिन  
लगता शापित जीवन
बंजर धरा 
रहूँ आजीवन
अश्रु अविरल
बहें ज्यों सावन
फिर भी
बुझती नहीं 
मन की अग्न
थक गई अखियाँ
तारे गिन-गिन
सूना है
रेतीला-सा गगन
जग पर मेरी व्यथा 
हुई नग्न
तुम हो लेकिन
अपने में मगन
सुनते नहीं हो मेरा रुदन
आओ कर लो
मेरा वरण
बनु तेरी बगिया की मालिन
सेज सजाऊँ
कलियाँ चुन-चुन !
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