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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



क्यों


अमरेश सिंह भदोरिया


 
भूल गए हो कैसे तुम 
अपने अधिकार की बातें ? 
कुछ भी लेना नहीं तुम्हें जब 
करते क्यों बाजार की बातें ?
1.
आते नहीं सामने क्यों जो चेहरे हैँ असली ? मुखौटे में जीवन जीने की रीत कहाँ से निकली ? परदे के पीछे रहना जब करते क्यों संसार की बातें ? भूल गए हो कैसे तुम अपने अधिकार की बातें ?
2.
अपने पौरुष बल पर क्या तुमको नही भरोसा ? पराधीनता के आगोस में क्यों तुम रहे हमेशा ? सिंहनी के वंशज होकर भी करते क्यों लाचार सी बातें ? भूल गए हो कैसे तुम अपने अधिकार की बातें ?
3.
डिग्रियों की बैसाखी पर कब तक रोज़ी ढूंढ़ी जायेगी ? दिशाहीन श्रृंखला में कब तक कड़िया जोड़ी जायेंगी ? देखी नहीं नींव जब तुमने करते क्यों आधार की बातें ? भूल गए हो कैसे तुम अपने अधिकार की बातें ?
4.
परिचय मिला नहीं जीवन में जिनको अभी किनारों का , हाल भला कैसे कहते वो बीच नदी की धारों का ? देखी नहीं नाव जब तुमने करते क्यों पतवार की बातें ? भूल गए हो कैसे तुम अपने अधिकार की बातें ?
5.
शकुनी के शतरंजी पाशों ने चली है जब भी टेढ़ी चालें , पाँच-पाँच पतियों की पत्नी फिर छठवें के हुयी हवाले , मर्यादा की चौपड़ है तो करते क्यों व्याभिचार की बातें ? भूल गए हो कैसे तुम अपने अधिकार की बातें ?
6.
इंद्र के मायावी रूपों से कब तक अहिल्ल्या छली जायेगी ? धर्म रक्षकों की छाती पर कब तक यूँ ही मूंग दली जायेगी ? शील भंग जब कर्म तुम्हारा करते क्यों संस्कार की बातें ? भूल गए हो कैसे तुम अपने अधिकार की बातें ?
7.
शर-शैय्या पर भीष्म पितामह की साँस कहाँ टूटने पायी ? शस्त्र और शास्त्र साथ मिले जब अधर्म ने है मुंह की खाई । करना है "अमरेश" तुम्हे कुछ करते क्यों न सुधार की बातें ? भूल गए हो कैसे तुम अपने अधिकार की बातें ?
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