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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



एक मुलाकात


डॉ०राम प्रकाश सक्सेना


दिग्विजय, मेरे बचपन का एक दोस्त है। इतने घनिष्ठ थे कि बचपन से एम.ए. तक यही सोचते रहे कि हम एक साथ रहेंगे। उस समय हम भी यह नहीं जानते थे कि जीवन में एक साथ रहना संभव ही नहीं है। यह प्रकृति का भी नियम है कि कुछ दिन साथ भले ही रह लें, लेकिन विदा तो अलग-अलग ही होना है। मैं अमेरिका चला गया, वह आगरा में बस गया। फिर बुढ़ापे में उसको भी मुंबई में अपने पुत्र के साथ रहना पड़ा। मैं भी अमेरिका में इतना रच-बस गया कि आना जाना कई दशकों के बाद होता था। इस वर्ष सितंबर में मुंबई अपने कंपनी के काम से आना पड़ा। उस समय मेरे साथ भारतीय मूल का एक अमेरिकन दोस्त निशांत भी अपने किसी काम से मेरे साथ आया था। हम लोग चर्चगेट के पास एक पाँच सितारा होटल में ठहरे। कुछ ऐसा प्रोग्राम बनाया कि अपनी कंपनी का काम समाप्त करने के बाद तीन-चार दिन मुंबई में सैर-सपाटा करेंगे। मैं एक-दिन अपने मित्र दिग्विजय के साथ उसके घर में बिताऊँगा । मैंने उसको फ़ोन करके बता दिया कि “मैं सोमवार को तुम्हारे घर आ रहा हूँ।”

सोमवार को जब दिग्विजय के घर जाने का प्रोग्राम बनाया, तब मैंने अपने मित्र निशांत से कहा कि वह भी मेरे साथ चले । मित्र ने कहा, “दोस्त तेरा है, मैं जाके क्या करूँगा, बोर हो जाऊँगा। अच्छा बता कि लौटेगा कब ?”

मैंने कहा, “बता नहीं सकता। शाम को जाम टकराएँगे। हो सकता है कि रात को मैं वहीँ ठहर जाऊँ।। फिर भी, मैं तुम्हे फ़ोन से सूचना कर दूँगा।”

ठीक छह बजे मैं होटल से अपने दोस्त के घर टैक्सी से चल पड़ा। मेरा दोस्त उस समय नई मुंबई में रहता था। रास्ता लंबा था। रास्ते में अपने दोस्त के साथ गुज़ारी यादों को ताज़ा करता रहा। अंतिम बार मैं 1980 में आगरे में उसकी कंपनी के दफ़्तर में ही मिला था। वह उस कंपनी में सी.ई.ओ. था।

मैं लगभग 11 बजे उसके दफ़्तर में पहुँचा था । मैं उसकी नेमप्लेट देखकर उसके ऑफ़िस में घुसने लगा, तभी एक हट्टे-कट्टे चपरासी ने कहा कि अपना कार्ड दे दीजिए और बैठ जाइए और आपका जब नंबर आएगा और बुला लिया जाएगा।

मैंने कहा, “अपने बॉस से कहो कि आपके बचपन का दोस्त निठल्लू ( दोस्तों के बीच मेरा निकनेम) आया है। जैसे ही चपरासी अंदर गया मेरा दोस्त भागता हुआ बाहर आया और मेरा हाथ पकड़कर अंदर ले गया और बोला, “अबे साले, कहाँ मर गया था? इतने वर्षों बाद याद आई?”

मैंने कहा, “ यह ठीक है कि मैंने तुझे याद नहीं किया पर ऐसा भी नहीं मैं तुझे भूल गया।”

उसने थोड़ी देर बाद अपनी पी.ए. को बुलाया और कहा कि “मैं अपने दोस्त के साथ घर जा रहा हूँ, मैं ऑफ़िस कल आ जाऊँगा और किसी फ़ाइल पर साइन करना ज़रूरी हो, तो फ़ाइल को घर पर भिजवा देना।”

उसने ड्राइवर को फ़ोन किया। कुछ ही क्षणों में ड्राइवर पोर्टिको में मेर्सिडीज़ बेंज़ कार लेकर हाज़िर हुआ । हम दोनों सीधे उसके घर गए। कार में ही उसने घर की मेड को फ़ोन कर दिया कि मैं अपने फ्रेंड के साथ आ रहा हूँ, यह-यह डिश बनाकर रखना। घर पहुँचते ही सबसे पहले उसने यह सवाल किया कि तुम्हारा सामान कहाँ है?

“होटल में।”

“मेरे होते हुए तू होटल में क्यों ठहरा ?”

“ठीक हैं मैं अपने ड्राइवर को भेजकर होटल से सामान मँगवा लेता हूँ।”

मैंने समझाया कि “मेरा एक मित्र भी है वहाँ पर।”

“होगा, उसका भी समान उठवा लेते है।”

मैंने आग्रह पूर्वक कहा, “हमने होटल में पेमेंट कर दिया है और कल शाम को तो अमेरिका जा ही रहे हैं ।"

मैंने उसके घर पर नज़र डाली। घर बहुत बड़ा था, महँगे सामान से सुसज्जित था। पत्नी एक बैंक में मैनेजर थी। एक लड़का मुंबई में और लड़की दिल्ली में काम कर रहे थे।

दोस्त ने ने मेड से पाजामा और कुर्ता मँगवा कर मुझे दे दिया और रात को वहीं ठहरने के लिए कहा ।

पाँच बजे उसकी पत्नी बैंक से आ गई , तब तक हम लोग कॉकटेल बनाकर पीते रहे और अपनी च्वाइस के डिशेज़ मेड से बनवाकर खाते रहे।

जैसे ही पत्नी घर में आई, मैंने पुराने अंदाज़ में कहा , “ भा...भी जी , आप तो अभी भी उतनी ही सुंदर लग रही हैं जितनी बहुत साल पहले ।

मिसेज़ दिग्विजय ने जवाब दिया, “ अमेरिका में क्या सुंदर महिलाएँ देखने को नहीं मिलती हैं, जो यहाँ देखने को आए?”

मैंने कहा, “भाभी जी, कुछ भी हो आप की बात ही कुछ अलग है।” वह मुस्कुराते हुए अपने कमरे में चली गईं ।

मैं यह सब सोच ही रहा था कि ड्राइवर ने कहा, “साहब हम नई मुंबई में सेक्टर 6 में आ गए अब घर का नंबर बताइए ?”

मुझे बहुत झटका लगा और कल्पना से वास्तविकता में आने में कुछ क्षण लगे।

बेल बजाने पर दिग्विजय ने दरवाज़ा खोला और अंदर ले गया, ड्राइंग रूम में बिठाया जहाँ उसका पुत्र , पुत्र-वधु और मित्र ब्रेकफास्ट कर रहे थे।

उसने मुझे भी ब्रेकफ़ास्ट टेबल पर बुला लिया। मित्र के पुत्र और पुत्रवधु ने औपचारिक नमस्कार किया। उसके बाद उन्होंने कोई बातचीत भी नहीं की । उनकी बॉडी-लैंग्वेज से ऐसा लगा कि मैं ‘अनवांटेड’ हूँ।

मैंने जाते ही पूछा “भाभी जी कहाँ है?”

“उनका पिछले साल ही देहांत हो गया।”

मैंने ब्रेकफ़ास्ट करना शूरू ही किया था कि पुत्र उठा और यह कहकर ऑफ़िस चला गया ,”पापा, मैं ऑफ़िस जा रहा हूँ , बारह बजे मेड आएगी, उससे कहकर अपने मित्र को लंच करा देना।”

कुछ ही देर बाद पुत्रवधु अपने कमरे से मेक-अप के बाद ड्राइंग रूम में आई और मेरे मित्र से कहा, “पापा, आप अपने दोस्त को लंच करा देना, लेकिन एक बजे बच्चों को स्कूल से लाना मत भूलना। मैं अपने स्कूल जा रही हूँ। हाँ, चार बजे बच्चों को ट्यूशन पर पहुँचाना मत भूलना।”

मित्र ने संक्षिप्त उत्तर दिया, “ठीक है।”

जब घर में हम दोनों अकेले रह गए, तब कुछ देर अंतरंग बातें होती रहीं। फिर मैंने ही कहा, “क्यों निठल्लू, तुम इतने पैसे वाले हो, यहाँ गुलामी का जीवन क्यों जी रहे हो? क्या बच्चों को लाने के लिए नौकर नहीं रखे जा सकते ।”

मित्र: “ज़रूर रखे जा सकते हैं । पर मैं ही नहीं चाहता। शायद तुमको इस बात का बुरा लगा होगा कि मेरी बहू ने बच्चों को स्कूल से लाने की ज़िम्मेदारी देकर मुझे नौकर बना रखा है। ”

मैं: “ हाँ , मुझे यही लगा।”

मित्र : “पर ऐसा नहीं है। पैसा खूब है पर बात करने के लिए कोई नहीं है। इस बहाने कम से कम बच्चों से बातचीत तो हो जाती है। इसी को मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ। यह काम नौकरों से कराया जाए, तो मैं और अकेला पड़ जाऊँगा।

मैं : “तुमने आगरा क्यों छोड़ दिया?”

मित्र :”जब तुम्हारी भाभी मर गई, तो वहाँ एकाकी जीवन काटना दुर्लभ हो गया। यहीं सोचकर मैं यहाँ आ गया कि यहाँ छोटे बच्चों से बातचीत में एकाकीपन नहीं खलेगा ।लड़के-बहू को तो टाइम ही नहीं है बात करने का।”

मैंने एक बजे से पहले ही यहाँ से होटल जाने का अपने मित्र से आग्रह किया। मित्र ने काफ़ी रोकना चाहा, लेकिन मैंने ही उनकी स्थिति को समझते हुए यही उचित समझा ।

मित्र ने कहा, “अगर तुम लंच करके नहीं जाओगे तो मुझे बुरा लगेगा।”

मैंने कहा, “तुम्हारी मेड अभी तक आई नहीं है एक बजे से पहले खाना खिला कैसे पाओगे?”

मित्र के आँखों में आँसू थे , जो मौन रहकर भी मेरे प्रश्न का उत्त्तर और बिदाई की सहमति दे रहे थे।

मैंने जब उस से विदा ली , हम दोनों के आँखों में आँसू थे। मैंने जाते-जाते कहा, ”चिंता मत करो दोस्त, शायद मेरा भी यही हाल होने वाला है।” टैक्सी मँगाई और मैं अपनी होटल की ओर चलने लगा।

रास्ते में सोचता रहा कि जब मैं टैक्सी में उसके घर जा रहा था तब क्या- क्या स्वप्न सँजोए हुए थे, पर वास्तविकता ने ह्रदय को झकझोर दिया । स्वप्नों के महल की अट्टालिका को भर-भराकर गिरते देख मेरा मन आहत हो गया। मैंने टैक्सी में बैठे-बैठे निशांत को फ़ोन लगाया “निशांत, मैंने जिस दोस्त की बात तुम्हे बताई थी वह दोस्त नहीं मिला। इसलिए मैं सीधा होटल पहुँच रहा हूँ। जितनी जल्दी होटल पहुँच सको, पहुँच जाओ, मैं अकेले बोर होना नहीं चाहता।

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इससे पहले 1980 में भारत आया था। उस समय मेरे साथ मेरा एक भारतीय अमेरिकन दोस्त निशांत अपने किसी काम से मेरे साथ था।

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