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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



पांचवा खंड -
नचन्या लौंडा


दिनेश चन्द्र पुरोहित


[१]

[मंच पर, रोशनी फैलती है ! जोधपुर स्टेशन का मंज़र सामने दिखाई देता है ! प्लेटफोर्म पर जाने के लिए, दीनजी भा’सा और सावंतजी उतरीय पुल चढ़ते दिखायी देते हैं ! इस वक़्त इन दोनों के कंधे पर बैग लटका हुआ है, अब ये दोनों पुल उतरकर प्लेटफोर्म पर आ जाते हैं ! आते ही वे दोनों, वहां लगी घड़ी पर नज़र डालते हैं ! इस समय घड़ी में, सुबह के नौ बजे हैं ! गाड़ी आने का वक़्त हो चुका है, इसलिए इस प्लेटफोर्म पर काफ़ी हलचल है ! चारों तरफ़ चाय वाले छोरे “चाय चाय” की आवाज़ लगाते जा रहे हैं ! इधर पुड़ी वाले वेंडर पुड़ी-सब्जी बेचने के लिए, प्लेटफोर्म पर बैठे यात्रियों को आशामुखी की तरह निहारते हुए आवाज़ लगाते जा रहे हैं ! उधर ये बूट-पोलिस करने वाले, यात्रियों के पांव पकड़कर उन्हें जूत्तों पर पोलिस करवाने के लिए रजामंद करते जा रहे हैं ! अचानक रशीद भाई को जल-सेवा करने का परम कर्तव्य, याद आ जाता है ! अब वे दीनजी भा’सा और सावंतजी की बोतलें लेकर, शीतल जल के नल की तरफ़ क़दम बढ़ा देते हैं ! इनके जाने के बाद फुठर मलसा तशरीफ़ लाते हैं, यहां ! और यहां खड़े दीनजी और सावंतजी का अभिवादन, ‘जय बाबा री सा’ कहकर करते हैं !]

फुठर मलसा – [अभिवादन करते हुए, कहते हैं] – जय बाबा री ! [सावंतजी के नज़दीक आकर, फिर कहते हैं] वाह भाई, सावंतजी ! सुनिये सावंतजी, मैं क्या कह रहा हूं आपसे ? [सावंतजी के ध्यान नहीं देने पर, वे वापस कहते हैं] सावंतजी, मैं आपसे ही अर्ज़ कर रहा हूँ !

[सावंतजी के चुप रहने पर, फुठर मलसा अपनी हथेली पर चूना और ज़र्दा रखकर, उस मिश्रण को अंगुठे से मसलते हैं ! फिर दूसरे हाथ से लगाते हैं, फटकारा ! अब ज़र्दे की खंक उड़ती है, कहीं यह खंक नासछिद्रों में चली न जाए ? इससे बचने के लिए, सावंतजी उनसे थोड़ा दूर हटते हैं ! फिर, जनाबे आली उन्हें नसीहत देते हुए कहते हैं !]

सावंतजी – [ज़र्दे की खंक से बचने के लिए, थोड़ा दूर हटकर कहते हैं] – आप से तो मालिक, थोड़ा दूर रहकर ही ‘जय रामजी की’ करनी चाहिए ! आप ठहरे साहब लोग, और मैं बेचारा हूं ग़रीब पीकर...मगर कर्मों से अपुन दोनों एकसे, आप उड़ाते हैं ज़र्दा और हम बदनसीब उड़ाते हैं धूल !

फुठर मलसा – [हंसते हुए कहते हैं] – उड़ाओ भाई, उड़ाओ ! खूब उड़ाओ, इस एफ़.सी.आई. महकमें की धूल ! ज़्यादा उड़ाओगे, तो बन जाओगे अस्थमा के मरीज़ !

[फुठर मलसा अब अपने होंठों के नीचे सुर्ती दबाते हैं ! तभी न मालुम कहाँ से उड़ती हुई खंक, चली जाती है सावंतजी के नासाछिद्रों में ! फिर क्या ? ज़नाब लगा देते हैं, छींकों की झड़ी ! बेचारे सावंतजी छींकते हुए, उनसे कहते हैं !]

सावंतजी – [छींकते हुए कहते हैं] – आंक छीಽಽ आंक छीಽಽ ! साहब, यह अस्थमा हम लोगों को पहले से है ! अब तो बापजी, आप जुकाम ज़रूर लगा देंगे ?

[फिर छींकते हैं, आख़िर जेब से रुमाल निकालकर नाक साफ़ करते हैं ! उधर फुठर मलसा दीनजी भा’सा के कंधे पर हाथ रखते हुए, कहते हैं !]

फुठर मलसा – [दीनजी के कंधे पर, हाथ रखते हुए कहते हैं] – अरे दीनजी भा’सा, यार आप तो कुछ बोलो ! क्या हाल है, आपके ?

[उनको और नज़दीक आते देखकर, दीनजी भा’सा झट उनका हाथ दूर लेकर थोड़ा पीछे खिसक जाते हैं ! फिर, कह देते हैं !]

दीनजी – [थोडा पीछे खिसककर, कहते हैं] – माफ़ कीजिये, ज़नाब ! [रफतः रफतः कहते हैं] अभी मालिक आप, मुझे पीकदान समझकर ज़र्दे की पीक मेरे उज़ले वस्त्रों पर डाल देंगे !

फुठर मलसा – [कान पर हाथ रखकर, कहते हैं] – क्या कहा, भा’सा ? मैं तो प्रेम से आता हूं, आपके पास ! और आप भागते हैं, मुझे देखकर ? मानो, मैं कोई पागल काबरिया कुत्ता हूं ? [नीचे फर्श पर, पीक थूकते हैं]

दीनजी – आप क्या हैं, यह बात आप से ज्यादा कौन जानता है ? [उतरीय पुल की तरफ़, इशारा करते हुए कहते हैं] फुठर मलसा, ज़रा उधर देखिये..पुल से, कौन नीचे उतर रहे हैं ? मुझे तो यह महानुभव, दयाल साहब ही लगते हैं ! अब आप उनके पास तशरीफ़ ले जाइए, और अपना बकाया काम शीघ्र पूरा करवा दीजिये ! अब आप यह समझ लीजिये, आप दोनों का तबादला हो चुका है..बाद में आप, मिलने वाले नहीं !

फुठर मलसा – अरे भा’सा, आपने अच्छा याद दिलाया ! अभी जाता हूं उनके पास, और जाकर कमेटी की रिपोर्ट पर उनके हस्ताक्षर ले लेता हूं ! नहीं तो यह ज़नाब, हो जायेंगे गायब !

[फुठर मलसा उतरीय पुल की तरफ़ अपने क़दम बढाते हैं, उनके रूख्सत होने के बाद रशीद भाई इनके निकट आते हैं ! और दोनों को पानी की बोतलें थमाते हुए, कहते हैं..]

रशीद भाई – [बोतलें थमाते हुए, कहते हैं] – अच्छा हुआ, भा’सा ! आपने साहब को, दयाल साहब के दीदार करवा डाले ! ना तो मुझको, मामूजान की तरह फुटास की गोली देने की जुगत लड़ानी पड़ती !

दीनजी – यह किसके मामूजान ? अरे वही, एक आंख वाले ‘प्यारे मियां !’ रशीद भाई इनका नाम लेते ही आपका वो डायलॉग याद आ गया, क्या कहते थे आप ? “मामू प्यारे, आ गए रंग में भंग डालने..बांगी कहीं के !”

सावंतजी – कोई तो बोलिए, यार ! यह मामूजान आख़िर है, कौन ? किसके मामूजान हैं ?

[पाली जाने वाली “अहमदाबाद-मेहसाना” लोकल गाड़ी, प्लेटफोर्म नंबर पांच पर आती दिखाई देती है ! इसकी तेज़ आवाज़ के आगे, इन लोगों की बातें सुनायी देनी बंद हो जाती है ! गाड़ी प्लेटफोर्म पर आकर रुकती है !]

रशीद भाई – फिर सुन लेना यार, किस बात की उतावली है ?

सावंतजी – बात तो सही है, हम सभी कौनसे फुठर मलसा और दयाल साहब की तरह भाग्यशाली हैं ? जो हमारा यह, रोज़ का आना-जाना मिट जाय ? मगर हम लोग ठहरे, करमठोक ! फुठर मलसा हेड ऑफिस जाकर हमारे ख़िलाफ़ ऐसे बीज बोकर आ गए, अब हम स्वप्न में भी जोधपुर तबादला होने की बात सोच नहीं सकते ! फिर क्या ? कभी भी सुन लेंगे, मामूजान के किस्से ! अभी तो आप सभी, डब्बे में दाख़िल हो जाइए !

[यह गाड़ी यार्ड में जाकर धुलकर आयी है, इस कारण कहीं भी गन्दगी का नाम नहीं ! इसे देखकर, सावंतजी कहने लगे..]

सावंतजी – वाह, भाई वाह ! क्या चमक रही है, गाड़ी ? अब तो भगवान इस गाड़ी को इन मंगते-फ़क़ीरों से बचाए रखे, तो अच्छा रहे ! ना तो ये कमबख्त, पूरी गाड़ी की सफ़ाई-व्यवस्था बिगाड़ देंगे !

रशीद भाई – मंगते-फकीरों को छोड़िये, जनाब ! आप बात कीजिये फुठर मलसा की, जो पीक थूक-थूककर पूरा केबीन ख़राब कर डालते हैं !

दीनजी – आगे बढ़ो, प्यारों ! और जाकर, सीटों को रोकों ! बातों की फुलवारी का आनंद तो, गाड़ी में बैठे-बैठे ले लेंगे ! बस, गाड़ी में दाख़िल होने की जुगत लड़ाइए ! क्या करें, साथियों ? अभी-तक, शयनान डब्बों के दरवाज़े बंद हैं ! लोक खुलेंगे, तब ही हम दाख़िल हो पायेंगे !

रशीद भाई – किसकी फ़िक्र करते हो, भा’सा ? इस वक़्त यह आपका सेवाभावी रशीद मौजूद है, फिर काहे की फ़िक्र ? आप कोई तक़लीफ़ मत करो, अभी मैं पीछे जाकर डब्बे में दाख़िल होने की कोशिश करता हूं ! अन्दर जाकर, डब्बे के सारे दरवाज़े खोल दूंगा ! तब आप आराम से, अन्दर दाख़िल होने की तैयारी कर लेना !

[रशीद भाई डब्बे के जोड़ को फांदकर, गाड़ी के उस ओर चले जाते हैं ! वहां जाकर शयनान डब्बे का दरवाज़ा खोलकर, अन्दर दाख़िल हो जाते हैं ! फिर, डब्बे के सभी दरवाज़े और खिड़कियाँ भी खोल देते हैं ! अब वे एक खिड़की से बाहर झांकते हुए, अपने साथियों को पुकारते हुए कहते हैं !]

रशीद भाई – [आवाज़ देते हुए, कहते हैं] – आ जाओ, आ जाओ भा’सा..आ जाओ, सावंतजी ! [बैग को खूंटी पर लटकाकर, अपनी सीट पर बैठ जाते हैं ! सावंतजी और दीनजी भा’सा बैग लिए, डब्बे में दाख़िल होते हैं ! फिर केबीन में आकर वे दोनों, खिड़की वाली आमने-सामने की सीटों पर बैठ जाते हैं ! अब दीनजी भा’सा, रशीद भाई से कहते हैं..]

दीनजी – अरे उस्ताद, आपका मामूजान कैसा आदमी था ? जिसने आखिर आपको, नचंया लौंडा का खिताब नवाज़ ही दिया ! याद आये, वे दिन ?

रशीद भाई – [लबों पर, मुस्कान बिखेरते हुए कहते हैं] – क्या करें, भा’सा ? मेरे अन्दर जो नृत्य कला का शौक है, उसके कारण पूरे दफ़्तर के कर्मचारी मुझे कलाकार की हैसियत से पहचानते हैं !

दीनजी – कभी आपकी कलाकारी, किसी ने देखी क्या ?

रशीद भाई – हां ! एक बार यों हुआ, डिपो मैनेजर के तबादले की पार्टी चल रही थी ! उस वक़्त करणी दानजी और माना रामसा ने देख लिया मुझे मुगले आज़म का “प्यार किया तो डरना क्या..’’ वाला गीत गाते हुए ! अरे जनाब, उसी दिन से ये दोनों मेरे पीछे लग गए के..

सावंतजी – कैसे पीछे लगेंगे, तेरे ? यार, तू कोई जन्नती हूर है ?

रशीद भाई – अरे, भाई साहब ! जन्नती हूर नहीं हूं, तो क्या ? बोलीवुड की नर्तकी ‘हेलन’ की रूह तो मेरे बदन में है ! लीजिये, आगे सुनिए ! माना रामसा और करणी दानजी ने मुझसे शर्त लगायी, के ‘अगर मैं उनको हेलन की स्टाइल में नृत्य करके उनको दिखला दूं, तो वे मेरे ऊपर सौ रुपये वारकर मुझे दे देंगे !’

सावंतजी – हां, याद आया ! तब आप अनुभवी कलाकार की तरह, नाचे ! अब आपको एक हिदायत दे देता हूं, आप अब यहां मत नाचना ! ना तो इस बेचारे गुलाबा हिज़ड़े का धंधा चौपट हो जायेगा ! [खिड़की से बाहर ज़र्दे की पीक थूकते हैं] क्या कहूं, आपको ? आप वास्तव में ठहरे नचंये लौंडे ! अब कहिये, इस मामू ने आपको कैसे यह खिताब नवाज़ा ?

रशीद भाई – [लम्बी सांस लेकर कहते हैं] – अब तो ज़नाब, मुझे सुनानी होगी इस मामू की पूरी दास्तान ! सुनिए, मैं और मेरा मामूजान हमउम्र के लौंडे ठहरे ! शायद हम दोनों की उम्र में, एक या दो महीने का अंतर रहा होगा ! उसका मेरे ऊपर रोब झाड़ने का एक ही वजह रही, वो है उसका अम्मीजान का भाई होना !

सावंतजी – मामा उम्र में, छोटा हो तो क्या ? उसका ओहदा बड़ा होता है !

रशीद भाई – जी हां ! अब आप समझ गए, वो मामू मेरे अब्बाजान का साला ठहरा और साथ में मेरे चाचा मजीद मियां का भी साला ठहरा ! क्योंकि, मेरी एक मासी का निकाह चाचा मजीद मियां के साथ हुआ ! अब मैं जिक्र उन घटनाओं का करूंगा, तब हम दोनों करीब १७-१८ साल के लौंडे थे ! हमारी चढ़ती जवानी का खून, उबाल खा रहा था !

[रशीद भाई किस्सा बयान कर रहे हैं, सभी श्रोताओं की आँखों के आगे जवानी-ए-दास्तां के मंज़र चल-चित्र की तरह छा जाते हैं ! अब रशीद भाई के अब्बाजान अब्दुल अजीज़ साहब की हवेली का मंज़र सामने आता है ! सुबह का वक़्त है, जिलकन एक तरफ़ करके मजीद मियां दालान में दाख़िल होते हैं ! मजीद मियां का एक पांव किसी हादसे में दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के कारण, काम नहीं करता ! इसलिए चलने के लिए, उन्हें बैसाखी का सहारा लेना पड़ता है ! अब वे चौक में आकर, कई बार अपने बड़े भाई अब्दुल अजीज़ साहब को आवाज़ देते हैं ! आखिर आवाज़ देते, बेचारे थक जाते हैं ! फिर क्या ? चौक में पड़ी कुर्सी पर तशरीफ़ आवरी हो जाते हैं ! और कुर्सी के सहारे, अपनी बिसाखी को रख देते हैं ! थोड़ी देर बाद, सीढ़ियां उतरते किसी की पदचाप सुनायी देती है ! फिर, अब्दुल अजीज़ साहब के दीदार होते हैं ! उन पर निग़ाह गिरते ही, जनाब मजीद मियां गुस्से से उबल पड़ते हैं ! वे क्रोधित होकर, कहते हैं..!]

मजीद मियां – [गुस्से में कहते हैं] – भाईजान, मैं यह क्या सुन रहा हूं ? यह कायरा रशीद..

अब्दुल अजीज़ – [नज़दीक आकर कहते हैं] – आबे ज़ुलाल पीजिये, छोटे नवाब ! यों क्या आते ही, परिंदों की तरह फड़फड़ाने लगे ? [बेगम को आवाज़ देते हैं] अरी ओ, रशीद की अम्मी ! ज़रा एक ग्लास पानी लाइए, छोटे नवाब तशरीफ़ लाये हैं !

[अब अब्दुल अजीज़ साहब चौक में रखी खाली कुर्सी पर, तशरीफ़ आवरी होते हैं !]

मजीद मियां – [उठने के लिए बैसाखी थामते हुए कहते हैं] – यहां एक मिनट नहीं बैठ सकता, भाईजान ! अब तो मेरे लिए, इस घर में पानी पीना हराम है ! [ज़ोर से कहते हैं] बुलाइए उस कायरे को, अभी बात साफ़ होती है ! कहता हूं, सारी ग़लती आपकी है ! इस छोरे की सगाई क्यों की, मेरी छोरी के साथ ? हाय अल्लाह, यह तो इतना..बेउसूल..? ओ मेरे परवरदीगार, ऐसी क्या खता हो गयी मुझसे..अब मैं किसी को, मुंह दिखलाने के क़ाबिल नहीं रहा !

[अब्दुल अजीज़ साहब मजीद मियां की बांह थामकर, उन्हें वापस कुर्सी पर अच्छी तरह से बैठाते हैं ! अब दुपट्टे से सर ढककर रशीद मियां की अम्मीजान हमीदा बी आती है ! अभी उन्होंने एक तश्तरी थाम रखी है, जिसमें पानी से भरी ग्लासें हैं ! नज़दीक आकर वे कहती है..]

हमीदा बी – [तश्तरी को नज़दीक रखे स्टूल पर रखकर, सलाम करती हुई कहती है] - असलाम मियां ! खैरियत है ?

[सुनकर मजीद मियां जवाब नहीं देते, तब हमीदा बी कहती है]

हमीदा बी - सुबह-सुबह क्यों बिफर रहे हो, अपने लाडले भतीजे पर ? ऐसा कौनसा गुनाह कर डाला, उस बेचारे मासूम बच्चे ने ? [दोनों हाथ ऊपर ले जाती हुई, कहती है] ए मेरे ख़ुदा, सुबह-सुबह कैसे-कैसे इंसान ताने देने इस घर में आ जाते हैं..जिनकी ख़ुद के पांव सलामत नहीं, और आ जाते हैं इस टेडे आँगन में नाचने ?

मजीद मियां – काहे कटु शब्द कह रही हैं, भाभीजान ? अब मैं इस घर की तरफ़ देखूं, तो ख़ुदा मुझे दोज़ख़ नसीब करे ! हाय अल्लाह, इनके छोरे रशीद ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा ? कमबख्त, बेअदब ! [दोनों हाथ अपने सर पर रखकर, वे अच्छी तरह से बैठ जाते हैं] मेरी क़िस्मत फूट गयी, जो इस घर रिश्ता लाया !

हमीदा बी - छोटे मियां ! अब आप तसल्ली से पानी पीजिये, और अपना गुस्सा थूकिये ! पानी से क्या बेर ? अभी-तक आपको... अब्दुल अजीज़ – इतना गुस्सा क्या काम का, मियां शान्ति से कहिये..ऐसा क्या कर डाला, इस तुम्हारे भतीजे ने ? आसमान को सर पर उठा रहे हो, मियां..कोई कसूर हो तो कहिये !

मजीद मियां – कोई कसूर नहीं किया, आपके लाडले ने [हाथ नचाते हुए अपनी बात रखते हैं ] यों हाथ ऊंचे कर-करके, वह सड़कों पर नाचा था ! और ये करमजले इसके ऊपर कड़े-कड़े नोट घूमा-घूमकर, वार रहे थे ! इन कमबख्तों ने इतने सारे रुपये वारकर, हमारे ख़ानदान की इज़्ज़त उछाल डाली ! अब उनको क्या दोष दूं ? ग़लती इस कायरे ने की...

अब्दुल अजीज़ – क्या कहा, छोटे मियां ?

मजीद मियां – [तुनककर कहते हैं] – यही कह रहा हूं, भाईजान..यह बेउसूल, ख़ानदानी तहज़ीब भूल गया !

हमीदा बी – [रशीद भाई का पक्ष लेती हुई, कहती है] – इस पूरे मामले में, उससे खता कहाँ हुई ? वो बेचारा शरीफ़ बच्चा ठहरा, और आप उसका नाम बिगाड़कर बार-बार कहते जा रहे हैं ”कायरा कायरा” ? ख़ुदा ने इस बेचारे को, भूरी [बिल्लोरी] आंखें क्या दे डाली ? बस, आप बार-बार उसे कसूरवार ठहराते जा रहे हैं !

मजीद मियां – [क्रोधावेश में आकर, ज़ोर-ज़ोर से कहते हैं] – चुप-चाप बैठ जाओ, भाभीजान ! क्या आप, जानते नहीं ? सड़कों पर खुले आम इस तरह नचंये लौंडे की तरह नाचना, क्या यह हमारे ख़ानदान की रवायत है ? किसने आज़ादी दे दी इसको, खुले-आम नाचने की ? क्या ऐसा वाकया हुआ कभी, हमारे ख़ानदान में ? भाईजान, हम ख़ानदानी आदमी हैं ! हम नाचते नहीं, नचाते हैं !

अब्दुल अजीज़ – [सर थामकर, कहते हैं] – छोटे नवाब, आपकी बकवास सुनकर मेरे सर में दर्द पैदा हो गया ! अब आप मेहरबानी करके, चुप-चाप बैठ जाइए !

मजीद मियां – [गुस्से में] – मैं, क्यों बैठूं ? मैने, कौनसा गुनाह किया ? यह बात आपके साहबज़ादे को सोचनी चाहिए, के ‘उसके वालिद की तबीयत नासाज़ है, और वह खुले आम लोगों की बरातों में क्यों नाचता जा रहा है ?’ कमबख्त, इस नगमें पर नाचता है [गाकर बताते हैं] “बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है” यह कोई नगमा है ?

अब्दुल अजीज़ – [लबों पर मुस्कान फैलाकर] – इस नगमें में, कौनसी बुराई छिपी है ?

मजीद मियां – [तेज़ आवाज़ में] – मैं कहता हूं, इस छोरे की शादी कब हुई ? कैसे कह रहा है, मेरा महबूब आया है ? [फिर, धीरे-धीरे कहते हैं] कोई सलीक़ा सीखाया नहीं आपने, सीखाया होता तो उससे यह ग़लती नहीं होती !

[धीमे-धीमे क्या कह रहे हैं ? यह बात तो उन दोनों ने सुनी नहीं, बस वे तो उनके गीत गाने बेसुरे अंदाज़ को लेकर ख़िल-खिलाकर हंसने लगे ! फिर अपनी हंसी को दबाकर, हमीदा बी कह देती है..]

हमीदा बी – इतना गुस्सा काम का नहीं, छोटे नवाब ! आख़िर है तो, आपका मासूम भतीजा ! ऐसा लगता है, किसी पागल ने आपको बहका दिया होगा ?

मजीद मियां – मुझे कौन बहका सकता है, क्या मेरे सर के अन्दर दिमाग़ नाम की कोई चीज़ नहीं है ? भाभीजान, आपसे क्या कहूं ? इस कायरे ने वहां खड़े बड़े-बुजुर्गों को बहका दिया, उनके हाथ पकड़-पकड़कर उन्हें नचा दिया ! वो भी भाभीजान, बेहूदी धुनों पर !

[अब हमीदा बी से रहा नहीं गया, वे खुलकर हंसने लगी ! इनको हंसते देखकर, मजीद मियां का गुस्सा बढ़ने लगा ! अब वे बेक़ाबू होकर, तल्ख़ आवाज़ में कहने लगे !]

मजीद मियां – [बेक़ाबू होकर, गुस्से में कहते हैं] – हंसो मत, दांत निकालकर ! भाभीजान कह देता हूं, एक बार ! आज यह छोरा बरातों में नाचा, कल यही छोरा आपकी छाती पर चढ़कर नाचेगा ! फिर कहना मत, मैंने इस छोरे के लखन आपको बताये नहीं !

[ऐसा लगने लगा, कोई सीढ़ियां उतरकर इधर ही तशरीफ़ ला रहा है ! थोड़ी देर बाद, रशीद भाई आते दिखायी देते हैं ! रशीद भाई यहां आकर, मजीद मियां को सलाम करते दिखायी देते हैं !]

रशीद भाई – आदाब, चच्चाजान !

मजीद मियां – [गुस्से में] – आदाब गया, तेल लाने ! बेअदब, बेउसूल !

रशीद भाई – हुज़ूर, बेअदबी तो आप कर रहे हैं ! आपके बड़े भाईजान और भाभीजान आपके सामने बैठे हैं, और आप बेखौफ़ होकर बोलते ही जा रहे हैं ?

मजीद मियां – यों कहकर बरखुदार, तुम मेरी ज़बान बंद कर दोगे क्या ? सच्चाई छुप नहीं सकती..

[आगे का जुमला बेचारे भूल जाते हैं, या बोलना नहीं चाहते ? मगर रशीद भाई बोलकर उनको अगला जुमला सुना देते हैं !]

रशीद भई – ‘बनावट के उसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कागज के फूलों से !’ यही जुमला कहना चाहते थे, चच्चा ?

मजीद मियां – मैं कह रहा था, सच्चाई कल सबके सामने आएगी..तब किस-किस आदमी की ज़बान बंद कराओगे ? गली-गली, मोहल्ला-मोहल्ला इस ख़ानदान पर अंगुली उठायेंगे, और कहेंगे इस छोरे को देखकर ‘वो देखो, हवेली वाले ख़ानदान का नचंया लौंडा जा रहा है !’

रशीद भाई – [शान्ति से, समझाने की कोशिश करते हुए] – चच्चाजान थोड़ी तसल्ली से बताइये, के ‘यह नचन्या लौंडा, आखिर है कौन ? जिसके लखन देखकर आप कह रहे हैं, उसके कारण लोग हमारे ख़ानदान पर अंगुली उठायेंगे ?’

मजीद मियां – [गुस्से में] – अभी-तक तूने, सुना क्या ? [हाथ नचाने का अभिनय करते हैं, और साथ में बोलते जा रहे हैं] यह बरातों में नाचने वाला नचंया लौंडा, क्या मैं हूं ? क्या मैं अपनी ख़ुद की शिकायत लेकर, भाईजान के पास आऊंगा ?

रशीद भाई – [मुस्कराते हुए कहते हैं] – चच्चाजान, आप बहुत अच्छा नाच लेते हैं, क्या कहना आपका ? सदका उतारूं, आपका ! कहीं मेरी नज़र न लग जाए आपको ? मुक़तजाए उम्र में में ये वृद्ध लोग आपकी तरह रोज़ नाच ले, तो शत प्रतिशत उनके नयन और घुटने सलामत रहेंगे !

अब्दुल अजीज़ – सच्च कहा, रशीद तूने ! मैं तो अब यही कहूंगा, इस तरह नाचने से बदन की कसरत भी हो जाया करती है !

मजीद मियां – [क्रोधित होकर कहते हैं] – अ-लाहौल-विल-कूव्वत ! मैं तो आया, इस साहबज़ादे का नाच रुकवाने ! मगर यहां तो ये साहबज़ादे ख़ुद मुझ पर ही तौहमत लगा रहे हैं, के ‘यह नचंया लौंडा, मैं ही हूं ?’ भूल गए साहबज़ादे, किस नगमें पर आप इन आवारा सड़कों पर नाचे थे आप ? [बेसुर में गाकर बताते हैं] ‘बहारों ಽಽ फूल बरसाओ ಽಽ मेरा....’

रशीद भाई – [नगमें का मुखड़ा पूरा करते हुए कहते हैं] – “मेरे चच्चा आये हैं !” क्या ठीक है, चच्चा ? [थोड़ा गंभीर बनकर, कहते हैं] चच्चाजान, मैं आपकी दिल से इज़्ज़त करता हूं, आप मेरे सर पर चार जूत्ते मार सकते हैं....हुजूर, मैं उफ़ नहीं करूंगा ! मगर, आप ऐसे झूठे आरोप मुझ पर न लगाएं ! वैसे आप जानते ही हैं, मैं बेचारा ठहरा, अल्लाह मियां की गाय ! बात साफ़ है, जनाब जिनका आँगन ही टेडा है, वो क्या नाचना जाने ?

मजीद मियां – साहबज़ादे, मैं तेरा चाचा हूं ! ऐसी पागलों जैसी बातें, किया नहीं करता ! मेरे पास भरोसेमंद मुख्बिर ख़बर लाया, के ‘तुम बन गए हो, नचंया लौंडा ! किसी एरे-गैरे की बरात में, अपना हुस्न दिखलाते हुए नाचते रहे ! तुम्हें नाचते देखकर, कई लोगों ने तुम पर कड़े-कड़े नोट घूमा-घूमाकर वारे थे !’ यह सुनते ही, मैं हो गया बेनियाम ! झट आ गया यहां, फरियाद लेकर ! अब बेदिरेग कह रहा हूं, मुझे यह सगाई नहीं रखनी !

रशीद भाई – यहां किसे पड़ी है, गर्ज़ ? मैं बेचारा पहले से कह रहा था, रिश्ते के बीच सपकण [सम्बन्ध] करना अच्छा नहीं ! इससे आपसी मोहब्बत कम हो जाया करती है, हाय अल्लाह..इस सपकण के कारण, मेरी दुनिया गारत कर दी गयी ! ख़ुदा की पनाह, आपने झूठी तौहमत लगाकर इस छोटे से मामले को राई का पहाड़ बना डाला !

[इतना कहकर, रशीद भाई नाराज़ होकर बैठ जाते हैं सीढ़ी के पहले स्टेप पर ! फिर वे, चच्चा से कहते हैं !]

रशीद भाई – चच्चा आप ही बताएं, किस वाहियात लंगूर की बातों में आकर आप भ्रमित हो गए ? आप मेरे मुख़्तसर हैं, ज़नाब ! आपकी इज़्ज़त, मेरी इज़्ज़त है ! ऐसी वाहियात बातें सुनकर, आपने उस लंगूर का मुंह क्यों नहीं तोड़ डाला ? जो नालायक झूठी बातें कहकर, आपके कान भरता है !

मजीद मियां – [शांति से कहते हैं] – साहबज़ादे ! वह मुख्बिर भरोसेमंद है, जिसने इस दुनिया को देखा है एक आंख से ! वह किसी भी सूरत में, लंगूर नहीं हो सकता !

[मजीद मियां की कही हुई बात सुनकर, रशीद भाई खिल-खिलाकर हंसते हैं ! फिर अपनी अम्मीजान से कहते हैं..]

रशीद भाई – लीजिये अम्मीजान, पत्ता लग गया अब..यह माचिस की तीली सिलगाने वाला कौन है ? वह और कोई नहीं, आपका एक आंख वाला भाई प्यारे मियां है ! आखिर यही हुआ, खोदा पहाड़, और निकला चूहा ! चच्चाजान ने स्वयं, ख़ुद अपने मुंह से रहस्य खोल डाला के ‘वह मामूजान है !’

मजीद मियां – मैंने कब कहा रे, कब दी मैंने “क़ाबिलियत-एतराफ़” ? खर्रास कहीं के !

रशीद भाई - अब कुछ नहीं हो सकता, चच्चा ! आप एक बार सोचिये, आपने अभी क्या कहा था ? आपने कहा “मुख्बिर के ऊपर आपको पूरा भरोसा है, जिसने इस दुनिया को देखा है एक आंख से !” अब कहिये, वो एक अंक वाला कौन हो सकता है ?

[अब बात दूसरी हो गयी, यह मामला समझ में आते ही अब्दुल अजीज़ साहब और हमीदा बी खिल-खिलाकर हंसने लगे ! बेचारे मजीद मियां सर झुकाए चुप-चाप बैठ गए ! मंच पर, अंधेरा फ़ैल जाता है !]

[२]

[थोड़ी देर बाद मंच रोशन होता है, रशीद भाई सीढ़ी के स्टेप पर बैठे हैं ! वे चौक में कुर्सियों पर बैठे, अब्दुल अजीज़ साहब, हमीदा बी, और मजीद मियां को निहार रहे हैं ! इनके पहलू में एक और खाली कुर्सी रखी है ! पड़ोस के मकान की मुंडेर पर खड़ी अब्दुल अजीज़ साहब की आपाजान फातमा बी, अपने लम्बे बालों को धूप में सूखा रही है ! उनको हंसी के ठहाके सुनायी देते हैं, वह अब नीचे चौक में झांकती है ! वहां बैठे अपने भाई और भाभी को, ठहाके लगाते देखती है ! फिर क्या ? वह नीचे झांकती हुई, अपने भाई को ज़ोर से आवाज़ देती हुई उन्हें कहती है !]

फातमा बी – [ज़ोर से आवाज़ देती हुई, कहती है] – क्या बात है, अब्दुला भाई ? कहीं छोटे मियां, कोई मुज़्दा लेकर तो नहीं आये ? रशीद के निकाह की तारीख़ तय हो रही है, क्या ? अगर यह सच्च है तो, मैं नीचे आकर आप सब का मुंह मीठा करा दूं ?

मजीद मियां – [चिढ़े हुए कहते हैं] – मुज़्दा लाये, मेरी जूत्ती ! आपाजान, मैं यहां सगाई तोड़ने के लिए आया हूं ! तौबा.. तौबा ग़लती हो गयी, मुझसे ! इस छोरे के लखन देखे बिना, ग़लती से रिश्ता कर डाला ! ख़ुदा रहम, क्या देखा मैंने इस अक्लेकुल दामाद में..?

फातमा बी – जाईद अज़ उम्मीद है, छोटे मियां ! यह मेरा भतीजा लाखों में एक है, इस रिस्ते को तोड़ना मत ! ना तो, बाद में पछतायेगा ! सच्च कह रही हूं, ऐसा अच्छा रिश्ता खोने के बाद तूझे कोई अच्छा रिश्ता मिलेगा नहीं..फिर खाली, इन आँखों से तिफ्लेअश्क गिराएगा ! बाद में, कुछ होना नहीं !

मजीद मियां – [ज़ोर से कहते हैं] – आंसू गिरेंगे, तो गिरने दीजिये आपा ! मगर मैं तसन्नो पसंद करने वाला इंसान नहीं, सीधा-साधा ख़ानदानी आदमी ठहरा ! तामात नहीं कर रहा हूं, आप ध्यान से सुन लीजिये मेरी बात नीचे आकर ! इतनी देर तक लग्व करते-करते, मेरे सर में दर्द होने लगा है !

[फिर क्या ? दोनों छत्तों के बीच की दीवाल [बिंडी] फांदकर, फ़ातमा बी आ जाती है अब्दुल अजीज़ साहब के मकान की छत पर ! फिर झट सीढ़ियां उतरकर सीधी चली आती है, नीचे चौक में ! वहां रखी खाली कुर्सी पर, आकर बैठ जाती है ! अब, वह कहती है..]

फातमा – क्या मफ़हूम है, तेरा ? अब बोल, मियां..काहे चुप हो गया, मुझे देखकर ? आखिर, मुझे यहां क्यों बुलाया ? और बता, यहां आने की क्यों तकल्लुफ़ की..तूने ?

मजीद मियां – आपाजान ! मैं बेनियाम हो गया, यह सुनकर के ‘आपका यह लाडला भतीजा रशीद, अब नचंया लौंडा बन चुका है !’ इस साहबज़ादे का मिजाज़ तो देखिये, आप ! शादी की बरातों में नाचा करता है ! क्या ठुमका लगता है ? जिसे देख़कर लोग, इस पर कड़े-कड़े नोट वारते हैं !

फातमा बी – यह बात, तूझे किसने कही ? के, ‘यह छोरा बरातों में, नाचा करता है !’ [रोब से] कोई दूसरा नाचता होगा, और तू किसी और के भड़काने से बहक गया होगा ? ख़ुदा रहम, कब से ख़ानदान की तखरीब पढ़ता जा रहा है ?

मजीद मियां – आपाजान, वो अपना है ना..[ज़बान पर नाम आते-आते उसे रोक देते हैं, फिर कहते हैं] नहीं, नहीं ! मैं उसका नाम नहीं बता सकता, हरगीज़ नहीं ! अगर, उसका नाम लिया तो वह नाराज़ हो जाएगा ! उसने मना किया है....

फातमा बी – [क्रोधित होकर कहती है] – क्यों रे, उसका नाराज़ होना मुनासिब नहीं..और यहां तेरे बड़े भाईजान और बड़ी भाभीजान की इज़्ज़त की कीमत, तेरी आँखों से गिरती जा रही है ? और, रता जा रहा है बेफिज़ूल की बकवास ? बता, उसका नाम क्या है ? तू जानता है ? बिना सबूत किसी के ऊपर इलज़ाम लगा देने से, ख़ुदा भी उसे माफ़ नहीं करता !

मजीद मियां – [नम्रता से पेश आते हैं] – अपाजान ! किब्ला..आप इतनी गुज़ारिश करती हैं, तब इस नाचीज़ को बताना ही होगा उसका नाम ! सरे-ओ-अदब आपके सामने हाज़िर कर दूंगा उसे, मगर आपसे अर्ज़ है, अगर उससे कोई गुस्ताख़ी हो जाय तो आप उसे ज़लील मत करना ! [रशीद भाई की छोटी बहन सबीना को आवाज़ देते हैं] अरी ओ, सबीना ! ज़रा, मामूजान को बुलाकर लाइयो !

[सीढ़ियां उतरकर, सबीना आती है ! वह झुककर, सबको सलाम करती है ! बाद में चली जाती है, मामूजान को बुलाने ! थोड़ी देर बाद सबीना के साथ, मामूजान “प्यारे मियां” वहां हाज़िर हो जाते हैं ! मामूजान ठहरे, एक आंख वाले ! कहा जाता हा, “अंधों में, काणा राजा होता है!” यही कारण है, इस ख़ानदान में वे अपनी चालाकी और कुबदी दिमाग़ के जरिये इन समझदारों के बीच अपनी गिनती बुद्धिमान व्यक्तियों में करवा चुके हैं ! मजीद मियां की नज़र में, ये ज़नाबे आली किसी राजा या मंत्री से कम नहीं है ! मजीद मियां तो इनकी दी गयी हर सलाह को, आंख बंद करके मान लिया करते हैं ! अब ये आली ज़नाब यहां तशरीफ़ रखकर, सभी को देख डालते हैं अपनी इकलौती आंख घूमा-घूमाकर ! फिर वहां रखे स्टूल पर, आराम से बैठ जाते हैं ! सबीना सीढ़ियां चढ़कर, चली जाती है ! उसके जाने के बाद, मामूजान मजीद मियां से कहते हैं..]

मामूजान – [मजीद मियां से] – दुल्हे भाई, खैरियत है ? कैसे याद किया, ज़नाब ?

[अचानक उनकी निग़ाह में आ जाते हैं, रशीद भाई ! उनको देखते ही वे घबरा जाते हैं, कहीं उनकी लगायी चिंगारी से आग तो न लग गयी ? रशीद भाई तो पहले से खफ़ा है, बस उनसे नज़र मिलते ही वे तपाक से बोल उठते हैं !]

रशीद भाई – [मामू को ज़हरीली नज़रों से देखते हुए कहते हैं] – अब तू कभी आना, पान की दुकान पर ! तेरे गोबर भरे खोपड़े में यह बात बैठा लेना, के ‘तू अब दिलीप कुमार की फिल्म मुगल-ए-आज़म, देखने से रहा..’ समझ गया, मामू ?

अब्दुल अजीज़ – [रशीद भाई को नाराज़गी से देखते हुए] – अबे, ए रशीद ! क्या बक रहा है, साहबज़ादे ? कमाने के लिए तूझे बिठाया, पान की दुकान पर ! और तू लोगों को, मुफ़्त में फ़िल्में दिखाता जा रहा ही ? धंधे को चौपट कर डाला, तूने !

रशीद भाई – अब्बाजान, यह बात सही नहीं है ! आप मामू से ही पूछ लीजिये, ना.. !

मामूजान – [होंठों में ही] – रशिदिये ! तू तो निकला मेरा उस्ताद, कहाँ तो यार मैं तूझे फंसाना चाहता था मजीद मियां के चक्कर में..मगर अब यहां तो कमबख्त तूने, फिल्म का पास याद दिलाकर कबाड़ा कर डाला ? चित्रा सिनेमाघर पर पान की दुकान चलाता-चलाता, तूने दिलीप कुमार की फ़िल्में मुफ़्त में दिखलाकर मेरी तलब बढ़ा दी ! बिना फिल्म देखें, मुझसे रहा नहीं जाता ! अब क्या करूं, परवरदीगार ? अब तो इस भाणजे को इस ज़ाल से निकालना ही होगा, न तो फ़िल्म का पास गया तेल लेने ! [प्रगट में, अब्दुल अजीज़ साहब से कहते हैं] जीजा ! नाराज़ मत हो, भाणजा बहुत सीधा और मेहनती है ! अभी चित्रा सिनेमाघर में दिलीप कुमार की फिल्म लगी है, दर्शकों की भरमार है..बस वहां मुझे यह भाणजा, चाय की केन्टीन का ठेका दिला रहा है ! बस जीजा, बात यही है !

रशीद भाई – [आंखें तरेरकर, कहते हैं] – मैं तो तेरा धंधा जमा रहा हूं, और तू मेरा पांव खींचता-खींचता मेरी दुनिया बसने के पहले ही उजाड़ रहा है ? [मामूजान को आंख मारकर, इशारा करते हैं]

मामूजान – [मजीद मियां से] – क्या बात है, दुल्हे भाई ? आप कुछ समझते नहीं, इस ज़माने में रह गए भोले ! बैठे-बैठे, बना डाला राई का पहाड़ ?

मजीद मियां – [झल्लाते हुए] – क्यों बरखुदार, क्या मैं आपको राई बेचने वाला पंसारी लगता हूं ? बेअदब, आपने यह नहीं कहा के ‘खुली सड़कों पर [हाथ नचाते हुए] यों हाथ ऊंचे करके यह भाणजा नाचा था ! और लोगों ने, इसके ऊपर नोट घूमा-घूमा के बरसाए थे ! ऐसा लगता था, यह रशीद नहीं है ! बल्कि, नाचने वाली पातुर है..जो लोगों को बेहया अदाएं दिखलाती हुई, उनका मनोरंजन करती है !’

[यह सुनते ही, मामूजान ज़ोर से ठहाके लगाकर हंसते हैं ! फिर अपनी हंसी दबाकर, वे कहते हैं..]

मामूजान – [हंसी दबाकर, कहते हैं] - सच्च, दुल्हे भाई ? इस ज़माने में आप भोले कैसे रह गए, ज़नाब ? आप पर भरोसा करके, मुझे कोई बात आपको कहनी नहीं चाहिए ! अब क्या कहूं, आपसे ? आप तो ज़नाब, छोटी सी बात का बना देते हैं राई का पहाड़ ! अब कहिये ज़नाब, आपके दिमाग़ में कौनसा फ़ितूर चल रहा है बेफिज़ूल विवाद बढाने का ?

मजीद मियां – बरखुदार, खबरदार ! दूसरी बार कह दिया मुझे, पंसारी ? कान खोलकर सुन लीजिये, मियां ! मैं एक ईमानदार सरकारी मुलाज़िम हूं, तुम्हारी तरह ठौड़-ठौड़ भीख माँगने वाला इंसान नहीं हूं जो लोगों के आगे इस तरह भीख मांगता रहे के ‘आर्डर दे दीजिये, मालिक !’ ..जो मौसम की तरह, धंधा बदलता रहे ! आप कभी बन जाते हैं, एजेंट तो कभी बन जाते हैं ठेकेदार ? समझ गए, क्या समझे ?

मामूजान – काहे नाराज़ हो रहे हो, दुल्हे भाई ? अब सही मुद्दे पर, आ जाइये ! सुनिए, इस बेचारे को कहाँ आता है नाचना ? यह बेचारा तो फंस गया, उस बरात में ! इसके दोस्तों ने इसको पकड़कर इसके हाथ ऊंचे कर डाले, और उधर बैंड वालों ने नयी-नयी मादक धुनें बजा डाली !

मजीद मियां – झूठ बोलना कुरान-ए-शरीफ़ में मकरुर काम गिनाया गया है, क्या यह बात सच्च नहीं के ‘इस रशीद ने बड़े-बुजुर्गों के हाथ पकड़कर, उनको भी जबरदस्ती नचा डाला ?’ अब कहिये, इस तरह उनको नचा देना कोई बेअदबी है या नहीं ? बेअदबी नहीं है, तो यह क्या है ?

मामूजान – इतने भोले मत बनो, दुल्हे भाई ! आपका यह भोलापन देखकर, कोई आपकी लंगोटी उतारकर न ले जाय ? और इधर आप, हाय अल्लाह हाय अल्लाह चिल्लाते रहें !

मजीद मियां – बरखुदार, अपनी ज़बान पर लगाम दीजिये ! कहीं ऐसा न हो, हमारी रेशमी जूत्तियां आपके सर पर सवार न हो जाए ?

मामूजान – [शांति से समझाते हुए] – इतनी नाराज़गी किस बात की, दुल्हे भाई ? मैंने तो आपसे यही कहा, के ‘बेचारा भाणजा इन बाज़ा बजाने वालों के बीच में फंस गया, तब उसने बचने के लिए पास खड़े बड़े-बुजुर्गों के हाथ थामकर उस घेरे से बाहर निकलना चाहा ! उस कोशिश में, उन लोगों के हाथों में थामे हुए नोट बिखर गए...इस नादान भाणजे के ऊपर...

मजीद मियां – आगे कहिये, बरखुदार !

मामूजान – फिर क्या ? ये सारे रुपये चारों ओर बिखर गए, आख़िर बात यह थी नोट बिखेरने की..मगर आप जैसे मुख़्तसर ने नमक-मिर्च मिलाकर रायता फैला दिया के ‘इस छोरे के ऊपर नोट वार-वारकर इस पर नोट बरसाए गए, मानो यह रशीद मियां न होकर नाचने वाली पारु जान हो ? इस तरह आपने बना दिया इसको, नचन्या लौंडा !’

[इतनी लम्बी तक़रीर करने के बाद मामू, मुकर्रम मजीद मियां को देखते हुए लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगे ! इस तरह आराम की सांस लेने के बाद, मामूजान आगे कहने लगे !]

मामूजान – अब मैं दुल्हे भाई, आपको सच्ची बात बताना चाहता हूं ! सुनिए, रुपये तो बहुत दूर की बात है ! यहां तो इस बेवकूफ़ के ऊपर, कोई चवन्नी वारकर इस पर बरसाने वाला नहीं ! इस बेउसूल को आख़िर, आता कहाँ नाचना ? जिसका ख़ुद का आँगन टेडा हो, वह क्या नाच सकता ?

रशीद भाई – [चिढ़ते हुए] – ए मामू, ज़बान संभालकर बोला कर ! आँगन मेरा नहीं, तेरा टेडा है ! क्योंकि तू है एक आंख वाला, यानि काणा ! तेरी फितरती दिमाग़ के कारण यह मामला बन गया है, अदालत-ए-माज़रा ! साले मामू हम लोग तो शौक से लड़ाते हैं, मुर्गों को ! मगर तू तो ऐसा कमबख्त निकला, जिसने इंसानों को मुर्गा समझकर उन्हें आपस में लड़ा दिया !

फातमा बी - अब रहा क्या, बाकी ?

रशीद भाई – [मामूजान से] - अब मामू, क्या कहूं तूझे ? कहना होगा "मामू प्यारे, बांगी कहीं के ! आ गये प्यारे, रंग में भंग डालने ! साले, बांगी कहीं के !"

[फ़ातमा बी लम्बी सांस लेने के बाद, ऊंचे हाथ ले जाते हुई अंगड़ाई लेती है ! फिर कुर्सी से उठती हुई, कहती है..]

फ़ातमा बी – [कुर्सी से उठाते हुए, कहती है] – ख़त्म कीजिये, यह लफ्ज़ी-इख्तिलाफ़ ! हाय अल्लाह, सुबह-सुबह निक्कमें इंसान की तरह यहां आ गयी मैं ! ना तो घर का कोई काम किया, न कोई काज़ ? आ गयी यहां, परायी पंचायती करने ! ख़ुदा रहम, इन लोगों ने तो मेरे सर में दर्द पैदा कर डाला !

[फातमा बी अपना अर दबाती हुई, कहने लगी..]

फातमा बी – [मजीद मियां से कहती है] – सुन रे, छोटे मियां ! सारी बात आईने की तरह साफ़ हो गयी है, अब किसी बेवकूफ के बहकावे में आकर कल्पना के सागर में गौते मत लगाना ! अब जा, निकाह की तारीख़ तय कर ! कई सालों बाद, इस आँगन में खुशियाँ छायेगी ! बस, अब मैं बजाऊंगी डफ़ली ! और..

हमीदा बी – मैं गाऊंगी, बन्ने ! और...

रशीद भाई – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए] – और, चच्चाजान नाचेंगे !

मामूजान – [हंसते हुए कहते हैं] – एक टांग से नाचेंगे, हाथ में लेकर बैसाखी..फिल्म उपकार में, जैसे नाचे थे प्राण साहब !

मजीद मियां – [बनावटी गुस्सा जतलाते हुए] – हट, साले..!

मामूजान – साला तो मैं आपका हूं ही, साला यानी जोरू का भाई ! दुनिया एक तरफ़, और जोरू का भाई एक तरफ़ ! बस, अब आप जीजी को बुला दीजिये ! फिर आप दोनों फिल्म मुग़ल-ए-आज़म के दिलीप कुमार और मधु बाला की तरह, आप दोनों नाच दिखाते रहना !

मजीद मियां – [बैसाखी थामते हुए] – ज़रा रुकना, तो ! अभी दिखलाता हूं तांडव डांस.. बरखुदार, आपको जूत्ते मारकर !

[उठकर वे मामूजान को पकड़ने की कोशिश करते हैं, मगर मामूजान उनके हाथ आने वाले कहाँ ? मामूजान तो हो जाते है, नौ दो ग्यारह ! और बेचारे मजीद मियां, अपने हाथ मलते रह जाते हैं ! फिर क्या ? बेचारे बदनसीब मजीद मियां, अब दरवाज़े की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं ! हमीदा बी, रशीद भाई, अब्दुल अजीज़ साहब और फातमा बी सीढ़ियां चढ़ते दिखायी देते हैं ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

[३]

[मंच पर, रोशनी फ़ैल जाती है ! गाड़ी का मंज़र वापस दिखाई देता है, रशीद भाई, सावंतजी और दीनजी भा’सा अपनी सीटों पर बैठे दिखायी देते हैं ! रशीद भाई आगे का किस्सा बयान करते दिखायी देते हैं !]

रशीद भाई – [किस्सा बयान करते हुए] – अब आगे सुनिए, वक़्त बितता गया ! मेरे अब्बाजान और अम्मीजान अपनी पूरी उम्र लेकर, इस ख़िलक़त से रूख्सत हो गए ! मगर, मजीद मियां अल्लाह के फ़ज़लो करम से अभी मौजूद है ! और इधर मैं भी बाल-बच्चों वाला हो गया, और आप लोगों के साथ दफ़्तर जाने के लिए रोज़ इस गाड़ी से आना-जाना कर रहा हूं !

दीनजी – और, अपनी यह ज़िंदगी चल रही है दवाई की गोलियों पर ! इस तरह, आप अस्थमा की बीमारी लेकर बैठ गए हैं !

सावंतजी – क्या करें, भाई ? यह ज़िंदगी का सफ़र, तो गोलियों पर चलता रहेगा ! बस, अब हमारी ज़िंदगी घिसी-पिटी फिल्मों जैसी बन गयी है ! [रशीद भाई से] अरे, रशीद भाई किस्सा तो बयान कर, क्यों बातों की गाड़ी रोक रहा है ? अरे यार तेरे रोकने से, सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है ! बोल यार, आगे कौन-कौनसे खिलके होते हैं ?

दीनजी – अभी-तक कहानी अधूरी है, दोस्तों ! चलिए, मैं पूरी कर देता हूं ! सुनिए, अभी भी मजीद मियां को रशीद भाई की फ़िक्र सताती रहती है ! इस कारण वे एक दिन छोड़कर, हर दूसरे दिन रशीद भाई को संभालने इनके घर आ जाया करते हैं ! ये अभी कुछ साल पहले ही, रेलवे से सेवानिवृत हुए हैं ! एक दिन संध्या के वक़्त करीब सात बजे, आली ज़नाब इनके घर आ गए ! मगर तब-तक, रशीद भाई घर पहुंचे नहीं ! बस, ज़नाब हो गए बेनियाम ! तहक़ीकात करने के लिए, वे मोबाइल से फ़ोन लगाते-लगाते मेरा नंबर डायल कर बैठते हैं ..

[गाड़ी की रफ़्तार बढ़ती जा रही है, इंजन काला धुंआ छोड़ता हुआ आगे बढ़ रहा है ! ये काला धुंआ बादलों की तरह आसमान में फैलता जा रहा है ! धीरे-धीरे सभी श्रोताओं की आँखों के आगे, वाकया चितराम बनकर चल-चित्र की तरह छा जाता हैं ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच वापस रोशन होता है ! जिलकन हटाकर, मजीद मियां चौक में आते दिखाए देते हैं ! चौक में आकर वे कुर्सी पर बैठ जाते हैं, और पास कुर्सी के सहारे बैसाखी रख देते हैं ! फिर हाथ में बंधी घड़ी को देखकर, बड़बड़ाते हुए कहते हैं..]

मजीद मियां – [घड़ी देखते हुए, बड़बड़ाते हैं] – दो-तीन चक्कर काट लिए, इस घर के..मगर अभी-तक साहब बहादुर तशरीफ़ लाये नहीं ! इधर अब, घड़ी में शाम के बज गए हैं सात ! मगर, ज़नाब के दीदार होने का नाम नहीं ! इनको कहाँ है, ख़जालत ? सभी एम.एस.टी. वाले कभी पहुंच गए, अपने-अपने घर ! मगर ये ठहरे, लाड साहब के बच्चे !

[दोनों हाथ ऊपर करके, मजीद मियां अंगड़ाई लेते हैं ! अचानक इंजन की सीटी सुनायी देती है, सुनते ही उनकी फ़िक्र बढ़ जाती है ! आख़िर, वे जेब से मोबाइल निकालकर दीनजी भा’सा के नंबर डायल करते हैं ! रिंग आने पर, उसे अपने कान के पास ले जाते हैं ! तभी, दीनजी भा’सा की आवाज़ सुनायी देती है !]

दीनजी – [मोबाइल में बोलते हैं] – हेलो, कौन बोल रहे हैं ज़नाब ?

मजीद मियां – [मोबाइल पर उतावली में कह देते हैं] – दीनजी भा’सा, अभी-तक आपके मित्र आये नहीं अपने घर...

दीनजी – [मोबाइल में, उनकी आवाज़ पहचानकर कहते हैं] – अरे जनाब, आप तो रशीद भाई के ससुरजी बोल रहे हैं ? मालिक, आदाब ! आप ख़ुशअख्तर हैं, जनाब ! रशीद भाई जैसा दामाद पाकर, कौन ख़ुश नहीं रहेगा ?

[मोबाइल से, वे रोनी आवाज़ में कहते हैं]

मजीद मियां – [मोबाइल पर, रोनी आवाज़ में कहते हैं] – ख़ुशअख्तर नहीं ज़नाब, आजुर्दा ख़ातिर इंसान कहिये मुझे ! मुझे ऐसा दामाद मिला, जो अक्सर रूख्सत बिला इतला रहने का आदी है ! अब तो ख़ुदा के पास ही जवाब है, वे आली ज़नाब कब तशरीफ़ लायेंगे..अपने घर ?

दीनजी – [मोबाइल में कहते हैं] – फ़िक्र मत कीजिये, ज़नाब ! वे छोटे बच्चे नहीं है, अब तो वे नाना-दादा बन चुके हैं ! क्या कहूं ज़नाब, आपसे ? गाड़ी में रशीद भाई हमारे साथ ही थे, हम-सब पाली से तीन बजे वाली बेंगलुर एक्सप्रेस गाड़ी में बैठकर जोधपुर आये थे !

मजीद मियां – [मोबाइल पर कहते हुए] - अब कहाँ है, जनाब ? आप सभी आ गए, उनको कहाँ छोड़कर आ गए आप ?

दीनजी – [मोबाइल में कहते हैं] – जनाब रशीद भाई तो आज़कल, जल्दी ही आ जाया करते हैं.. जोधपुर ! मगर, इनकी एक आदत है गलत..

मजीद मियां – [घबराते हुए] – ऐसी कौनसी गलत आदत पड़ गयी, ज़नाब ? कहीं पीकर तो नहीं बैठ जाते..हाय ख़ुदा, अब मुझे यह दिन भी देखना बाकी रह गया ?

दीनजी – [मोबाइल में हंसते हुए] – हुज़ूर, फ़िक्र कीजिये मत ! ये पियक्कड़ नहीं है, मगर घुमक्कड़ ज़रूर बन गए हैं ! घर पर मन लगता नहीं, इसलिए गाड़ी से उतरने के बाद वे प्लेटफोर्म पर टहल लिया करते हैं ! वक़्त भी बीत जाता है, और भाई लोगों से मुलाक़ात भी हो जाया करती है !

मजीद मियां – [फ़िक्र करते हुए, मोबाइल पर कहते हैं] – क्या करें, दीनजी ? ये बच्चे नहीं रहे, यह कोई वक़्त है टहलने का ?

दीनजी – [मोबाइल में कहते हैं] – औरतों के पास बैठना उन्हें मंज़ूर नहीं, इस कारण वे प्लेटफोर्म पर कभी चाय पीते हैं तो कभी किसी जान-पहचान वाले के साथ करने बैठ जाते हैं, गुफ्तगू ! अरे हुज़ूर वे कह रहे थे, आज वे ज़रूर हमारे दीवानखाने पर तशरीफ़ रखेंगे !

मजीद मियां – [फ़िक्र करते हुए, मोबाइल पर कहते हैं] – क्या करें ? ये पूरे गैर जिम्मेदार बन गए, जानते नहीं कल पोते-पोतियों की शादी होगी और अभी तक इनका यही रवैया ?

दीनजी – [मोबाइल में कहते हैं] – हुज़ूर, रशीद भाई ठहरे खुशअख्तर ! पोते-पोतियों की शादी देखने की उनकी ख्वाहिश भी, जल्दी पूरी होने वाली है ! मगर मैं अभी-तक, अपने छोरे की शादी की जिम्मेदारी से फारिग़ नहीं हुआ हूं ! उसकी शादी होगी, दस फरवरी को..तब मैं फारिग़ हो जाऊंगा, केवल एक जिम्मेदारी से ! चच्चा सुनो, आज शाम को रशीद भाई मेरे घर ज़रूर आयेंगे !

मजीद मियां – [मोबाइल पर कहते हैं] – आपका ख़ासा तारीफ़-ए-क़ाबिल है ! आपको घर-परिवार की फ़िक्र है ! इधर देखो रशीद मियां को, ये मस्त मोला हैं..इनको कोई फ़िक्र नहीं ! इधर मेरी दुख्तरा इनकी फ़िक्र में गलती जा रही है, तिनका जैसा शरीर हो गया..ऊपर से उसे अस्थमा अलग है ! उसे डॉक्टर साहब के यहाँ ले जाकर, इलाज़ दिलाना, उनको याद रहता नहीं..कोई फ़िक्र नहीं, आपके दोस्त को !

दीनजी – [मोबाइल में कहते हैं] – फ़िक्र मत कीजिये, मिलने पर मैं उनको समझा दूंगा ! के, इतनी लापरवाही बरतनी अच्छी नहीं ! फ़ोन रख रहा हूं, अन्यथा आपका बिल बढ़ता जाएगा !

[मोबाइल बंद करने की आवाज़ सुनायी देती है, अब मजीद मियां जेब में मोबाइल रखकर रुमाल निकालते हैं ! फिर ललाट पर छाये पसीने के एक-एक कतरे को साफ़ करते हैं ! अब वे सबीना को, आवाज़ लगाते हैं !

मजीद मियां – [आवाज़ देते हुए] – अरी ओ सबीना, बेटी ज़रा आना तो.. प्यास लगी है, एक ग्लास पानी लाना !

[सीढ़ियां उतरने की आवाज़ सुनायी देती है ! थोड़ी देर बाद, सबीना पानी से भरा ग्लास लिए आती है ! आते-आते उसका पल्लू ढलककर कंधे पर आ जाता है, मजीद मियां को ग्लास थमाकर वह अपने पल्लू से सर वापस ढकती है ! अब वह उन्हें सलाम करके, उनसे कहती है..]

सबीना – क्या करूं, चच्चा ? दो दिन बाद वापस चली जाऊंगी ससुराल ! पीहर आते वक़्त, मेरी सास ने कहा था ‘अपने भाईजान को कहकर किसी डॉक्टर का इलाज़ ले लेना ! यहाँ कारू का खजाना नहीं पड़ा है, जो तुम्हारे इलाज़ पर खर्च करती रहूँ ?’ मगर, यहाँ भाईजान के पास कहां वक़्त, जो डॉक्टर के पास ले जाए मुझे ?

[मजीद मियां का रहम दिल इस बच्ची की हालत को देखकर, ग़म से भर जाता है ! वे उसके सर पर हाथ रखकर, उसे तसल्ली देते हैं !] मजीद मियां – [सबीना के सर पर हाथ रखकर, तसल्ली देते हुए] – सबीना, फ़िक्र मत कर ! अल्लाह पर भरोसा रख, अल्लाह मियां सब ठीक करेगा !

सबीना – चच्चा क्या कहूं, आपको ? कभी भाईजान आते हैं, रात के दस बजे या फिर कभी आते हैं ग्यारह बजे ! जब-तक भाईजान नहीं आते, तब-तक भाभीजान का कलेज़ा हलक में में उतर जाता है ! इधर उनको भाभीजान ने याद दिलाया, के ‘साथ में मोबाइल ले जाया करो !’ मगर भाईजान, जवाब दे देते हैं ‘मोबाइल तो गले की घंटी है, कौन रखे इसे ? मैं तो ठहरा, आज़ाद पंछी !’ मजीद मियां – सबीना तू फ़िक्र मत कर, बेटा ! आने दे रशीद मियां को, मैं अब यही बैठा हूं..उसकी पूरी क्लास लेकर ही जाऊंगा अपने घर ! तू देखती रहना बेटा, बाद में...

सबीना – अब मैं जाऊं, चच्चा ? ज्यादा देर मुझसे खड़ा रहा नहीं जाता, बीमारी के कारण बहुत कमज़ोर हो चुकी हूं ! [खांसती है, फिर दोनों हाथ ऊपर करती हुई ख़ुदा से अर्ज़ करती है] अल्लाहताला, अब इस कमज़ोर बदन को संभालने की शक्ति मुझमें रही नहीं ! अब मुझे बुला लीजिये, अपने घर ! मजीद मियां – चुप छोरी ! ऐसी पागलों जैसी बातें, नहीं किया करते ! ख़ुदा खैर करे, आप जल्द तंदरुस्त हो जाओगी बेटा ! फ़िक्र नहीं करनी बेटा, ख़ुदा पर भरोसा रखो !

[जेब में हाथ डालकर इमामज़ामिन बाहर निकालते हैं, फिर उसे सबीना को थमा देते हैं ! इमामज़ामिन थमाकर, वे उससे कहते हैं..] मजीद मियां – [इमामज़ामिन थमाकर कहते हैं] – इसको गले में डाल दे बेटा, यह कारचोब वाला इमामज़ामिन, इमामबाड़ा से लाया हूं ! सब ठीक हो जाएगा, अब तू मग़मूम रहना छोड़ दे ! ख़ुदा ने चाहा तो, तुम जल्द तंदरुस्त हो जाओगी !

[सबीना हाथ में इमामज़ामिन लेकर, उसे चूमती है ! फिर उसे अपने गले में डाल देती है, उसी दौरान मामूजान ज़िलक़न हटाकर अन्दर तशरीफ़ ले आते हैं ! अन्दर दाख़िल होते वक़्त, वे मजीद मियां को इमामज़ामिन थमाते देख लेते है, अपनी इकलौती आंख से ! मामूजान रहे, उनकी जोरू के भाई..उनको वो इमामज़ामिन न देकर, सबीना को कैसे थमा दिया ? बस, फिर क्या ? वे झट मजीद मियां से खफ़ा होकर, उनसे कह देते हैं...]

मामूजान – [नज़दीक आकर कहते हैं] – यह क्या, दुल्हे भाई ? क्या थमा रहे हो, चुप-चाप ? [पहलू में रखी कुर्सी पर बैठते हैं, फिर कहते हैं] हुज़ूर, आपके दीवानखाने में तशरीफ़ लाया..वहां आप मिले नहीं ? तब यहा चला आया, और मुकर्रम के दीदार पाकर ख़ुश हो गया ! मगर..

मजीद मियां – मगर, क्या ? बात को अधूरी न छोड़ो, आगे बयान कीजिये साहबज़ादे ! आप जानते नहीं, मैं पहले से मग़मूम हूं..रशीद मियां का इस तरह रूख्सत बिला इतला रहना, और घर की जिम्मेदारी से दूर रहकर बेफिक्र घूमना, किसको अच्छा लगता है ?

मामूजान – काहे फ़िक्र कर रहे हैं, इस भाणजे की ? वह तो कभी का जोधपुर आ गया ज़नाब, मगर अब मैं आपको यह नहीं बताऊंगा के ‘यह भाणजा, अब इस वक़्त कहां है ?’ क्या कहूं, दुल्हे भाई ? मेरे ऊपर आपका वसूक रहा नहीं, कुछ भी बताऊंगा..तो आप सारा भेद खोल देंगे, के ‘किसने यह बात, आपको बतायी ?’

मजीद मियां – कह दीजिये, कह दीजिये प्यारे मियां..मैं किसी को, कुछ नहीं कहूंगा !

मामूजान – ना दुल्हे भाई, ना ! आप भेद-भरी बातें लोगों को कहकर, रिश्तेदारी में झगड़ा पैदा करने की चिनगारी छोड़ देंगे...और, भुगतना मुझको पड़ेगा !

मजीद मियां – [तसन्नो करते हुए, कहते हैं] – मेरे अजीज़ साले बहादुर ! मैं ऐसा क्यों करूंगा, लख्तेज़िगर का बुरा करके मुझे क्या मिलेगा ? ऐसा मैं सपने में भी नहीं सोच सकता, साहबज़ादे ! यह बात सारी दुनिया जानती है, “जोरू का भाई... “

मामूजान – [बात काटते हुए] – बस..बस, दुल्हे भाई ! बहुत, मक्खनबाज़ी हो गयी ! ज़नाब आप वही आदमी है, जो काम पूरा होते ही दूर, और काम पड़ने पर आ जाते हैं नज़दीक ! ऐसी ही फ़ितरत है, ज़नाब की ! आपके कारण ही लोग़ ताने देते रहते हैं, मुझे ! हुज़ूर, आपके कारण नसीबे-दुश्मना-जान-ज़ोखिम वाली समस्या हो गयी है मेरे लिए ! बस, अब..

मजीद मियां – कहो बरखुदार, कहो !

मामूजान – हिदायत दे देता हूं, ज़नाब.. बस “यह बात मैंने आपसे कही, इसका भेद आप किसी को भी नहीं बतायेंगे !”

मजीद मियां – [मामूजान के सर पर हाथ रखकर, कहते हैं] – सरे अजीज़ की कसम ! मैं किसी को नहीं बताऊंगा, के “यह बात, आपने कही है..मुझे !” [मामूजान ख़ुश होकर, आगे बयान करते हैं ! और मजीद मियां कान देकर, उनकी कही बात सुनते नज़र आते हैं !]

मामूजान – [ख़ुश होकर, कहते हैं] – लीजिये, सुनिए ! भाणजे को जोधपुर आये हुए तीन घंटे हो गए हैं, और वह घूमता हुआ पहुंच गया दीनजी भा’सा के घर ! क्योंकि, आज उनके बच्चे की शादी है !

मजीद मियां – [उचकते हुए, कह देते हैं] – यह हो नहीं सकता ! दीनजी भा’सा ने ख़ुद कहा, के ‘उनके छोरे की शादी १० फरवरी को है !’ अब शादी के दिन ही, रशीद मियां जायेंगे उनके घर ! पहले जाने का, कोई सवाल नहीं !

[मजीद मियां ठहरे, भोले इंसान ! किसी की बात को वे पूरी सुनते नहीं, और तपाक से अनसुनी बात पर कर लेते हैं वसूक ! इनको कोई भी, कैसे भी भड़का सकता है ! फिर मामूजान तो ठहरे, ऐसे मसअले पैदा करने के उस्ताद ! अब मामूजान अपने होंठों पर मुस्कान बिखेरते हुए, कह डालते हैं ऐसी बात..जो बाद में, मसअले पैदा करती रहे !]

मामूजान – [मुस्कराते हुए कहते हैं] – यह कैसा अलील है, आपको ? झट हरेक की बातों पर भरोसा कर लेते हैं, आप ? कोई आदमी आपको कुछ भी कह दे, और आप बिना जांच किये तपाक से कर लेते हैं वसूक ? कुछ सोचा करो, पहले ! लीजिये, सबूत के साथ मैं अपनी बात रख रहा हूं !

[अब मामूजान अपनी जेब से, एक निमन्त्रण-पत्र निकालते हैं ! मजीद मियां हाथ में, उस निमन्त्रण-पत्र को थाम लेते हैं ! और उस कार्ड को पढ़ने के लिए, जेब से नज़दीक का ऐनक निकालने के लिए हाथ डालते हैं ! मगर, ऐनक हाथ आता नहीं ! और हाथ वापस खाली आ जाता है, बाहर ! अब वे उस कार्ड पर बिना नज़र गढ़ायें, देख लेते हैं..और वापस उस कार्ड को, मामूजान को लौटा देते हैं ! इस तरह घर पर ऐनक भूल जाने के कारण, बेचारे मजीद मियां उसे पढ़ने से मरहूम रह जाते हैं ! अब मामूजान, उनसे कहते हैं...]

मामूजान – हुज़ूर, कुछ पढ़ने में आया ? इसमें साफ़ लिखा है, ज़नाब ! के, ‘शादी आज ही होगी !’ अब समझ गए, दुल्हे भाई ? या फिर, मैं इस कार्ड को ज़ोर-ज़ोर से पढ़कर सुनाऊं ?

मजीद मियां – [मग़मूम होकर कहते हैं] – खर्रास निकले, दीनजी भा’सा ! हाय, मेरी बदक़िस्मती ! ख़ुदा रहम, कैसा भद्दा मज़ाक किया है..दीनजी भा’सा, आपने ? सच्च बोल देते तो क्या जाता आपका, मैं भी शिरकत कर लेता ? मगर, दीनजी आपने तो हरक़त कर डाली !

[ग़मज़दा मजीद मियां अपना सर पकड़कर, बैठ जाते हैं ! मुंडेर पर खड़ी उनकी आपाजान फ़ातमा बी, अपने गीले बाल सुखाती हुई नीचे चौक में झाँक लेती है ! इस तरह झांकने की यह आदत उनकी, पुरानी रही ! अभी वह कुछ बोली नहीं, उसके पहले उनके मोबाइल पर घंटी आती है ! मोबाइल ओन करके, वह उसे कान के पास ले जाती है ! अब वह मोबाइल पर बात करती हुई, रशीद भाई के मकान की सीढ़ियां उतरती है ! उधर मामूजान बैग में हाथ डालकर, डिजिटल केमेरा निकालते हैं, और सबूत की तौर पर मजीद मियां को फोटूएं दिखलाते हुए कहते हैं..]

मामूजान – [बैग में हाथ डालकर, केमेरा निकालते हुए कहते हैं] – लीजिये दुल्हे भाई, यह देखिये सबूत ! देखो, यह बटन दबाया और ये सारी फोटूएं दिखाई दी..[बटन दबाकर, उन्हें केमेरा थमाते हैं] देख लीजिये ज़नाब, इधर बैंड-बाजे बज रहे हैं ! और ये खड़े, बराती ! उधर देखिये ज़नाब, यह कौन नाच रहा है हाथ ऊंचे कर-करके ? इससे बड़ा सबूत, और क्या दूं ?

[फोटूएं देखकर, मजीद मियां की हालत कैसी हो गयी होगी ? मानो, काटो तो खून नहीं ! इस सदमे के मारे, बेचारे इतना ही बोल पाते हैं...]

मजीद भाई – [ग़मगीन होकर कहते हैं] – इतना कपट ? अपनी सगाई होने के बाद रशीद मियां ने वादा किया था, के ‘चच्चाजान, मैं बरातों में नाचता नहीं हूं !’ हाय रे, मेरे मुकद्दर ! मेरे जैसा मफ़लूक, अच्छा छला गया ? अब मैं किसके पास जाकर, इनकी शिकायत करूं ? [आसमान की ओर देखते हुए] ओ मेरे भाईजान, क्यों आप इतने जल्दी अल्लाह के प्यारे हो गए ? हायಽಽ रेಽಽ ! अब आपका यह लड़का, इस बुढ़ापे में भी नाच रहा है ! क्या कहूं, अभी भी यह इस रज़ील काम से इस आला ख़ानदान को माअयूब कर रहा है ? अब यह आपका मग़मूम भाई, कहाँ जाकर अपना मुंह छिपाए ?

[मग़मूम मजीद मियां की आँखों से आंसू गिरकर, रुखसारों पर बहने लगे ! तभी हाथ में मोबाइल थामे, उनकी आपाजान फातमा बी सीढ़ियां उतरकर चौक में आ जाती है ! आकर, वह कहती है...]

फातमा बी – [मजीद मियां को मोबाइल थमाती हुई कहती है] – यह ले, मोबाइल ! और कर ले, अपने जामाता से बात ! सर फोड़ा दिया..बेकार की बकवास करके ! तेरी आदत, राई का पहाड़ बनाने की छूटी नहीं ?

मजीद मियां – [कान के पास मोबाइल लेजाकर, गुस्से में कहते हैं] – हेलो रशीद मियां ! यह क्या कर डाला, तुमने ? मेरी नाक काट डाली, सरे आम !

रशीद भाई – [मोबाइल पर, कहते हैं] – चच्चाजान, मैं कोई सर्जन हूं या मेल नर्स या चीर-फाड़ करने वाला कसाई हूं ? जो कर दूं, आपके नाक की चीर-फाड़ ? [हंसी की आवाज़ आती है] चच्चा, अब आप वापस जोड़ लीजिये अपना नाक ! मुझे मालुम है, यह मामू आया था दीनजी के घर..मेरी मुख्बिरी करने ! मैंने जानबूझकर, फोटूएं खींचने दी, जो फोटूएं वह इस वक़्त आपको दिखला रहा है ! वही फोटो, हाथ ऊंचे किए हुए..

मजीद मियां – [संतोष धारण करते हुए, मोबाइल में कहते हैं] – ख़ुदा कसम, क्या आप सच्च कह रहे हैं ?

रशीद भाई – [मोबाइल पर कहते हैं] – आप जैसे ख़ुदापरस्त और मुक़र्रम ख़ुशअख्तर चच्चाजान का यह खैरख्वाह भतीजा, कैसे इस ख़ानदान को माअयूब कर सकता है ? अब आजुर्दा ख़ातिर रहने की कोई ज़रूरत नहीं, आपको ! लीजिये, सुनिए ! तिलक लगाने के बाद दीनजी के छोरे के ऊपर, मैंने हाथ ऊपर करके पुष्प बरसाए हैं ! इसके अलावा, मैंने किया क्या ? बस..उसी वक़्त, इस मामू ने फोटूएं खींच ली !

मजीद मियां – [मोबाइल में कहते हैं] – क्या कहा ? सच्च कह रहे हो, साहबज़ादे ?

रशीद भाई – [मोबाइल पर कहते हैं] – जी हां, आपने सही सुना ! अब कहिये, छोरे की सगाई में उसको माला पहनानी या उस पर पुष्प बरसाना..क्या गलत है ? क्या मेरा इतना भी हक़ नहीं, के ‘मैं अपने दोस्त के बच्चे की सगाई में, उस पर पुष्प बरसा सकूं ?’ हुज़ूर, जिसकी सगाई हो रही है, उस पर पुष्प बरसाना एक दस्तूर माना जाता है ! इस दस्तूर से, आप अनभिज्ञ नहीं हैं !

मजीद मियां – [मोबाइल में कहते हैं] – क्या, आज छोरे की शादी नहीं थी ? अब १० फरवरी को ही शादी होगी ? फिर, यह इल्तज़ा-ए-पैग़ाम क्या कह रहा है ?

रशीद भाई – [मोबाइल पर कहते हैं] – चच्चाजान ! आँखों पर, ऐनक चढ़ाया या नहीं ? या आप हो गए हैं, गोसगिरे ? चच्चाजान, यह कार्ड सगाई के दस्तूर का है ! क्या, इस मामू ने बताया नहीं आपको ? [हंसने की आवाज़ आती है] वह क्या बताएगा ? आख़िर, यह मामू है भी अनपढ़ ..ठोठी ठीकरा ! वह क्या जाने, अंग्रेजी पढ़ना ?

[फ़ोन में रशीद भाई की आवाज़ गूंज़ती है, फिर फ़ोन रखने की आवाज़ आती है ! अब मजीद मियां के चहरे पर, मुस्कराहट छा जाती है ! आपाजान फ़ातमा बी को मोबाइल थमाकर, वे मामू की ओर मुंह करते हैं..मगर, ये श्रीमान ४२० अपनी पोल खुलने पर, गधे के सींग की तरह उड़न-छू हो गए हैं ! मोबाइल लेकर, फातमा बी झल्लाती हुई कहती ही..]

फातमा बी – [झल्लाती हुई कहती ही] - तुम तीनों ही हो, शातिर ! अपनी आदतों से, बाज़ आते नहीं ! एक है काणा, दूसरा है खोड़ा और तीसरा है कायरा ! तब ही बुजुर्गों ने कहा है, के ‘काणा, खोड़ा, कायरा और सर से गंजा होय ! इन चारों से बात करो तो पहले हाथ में डंडा होय !’ कमबख्तों ने, मेरा सारा कीमती वक़्त बरबाद कर डाला ! अब मैं कब हवेली की साफ़-सफाई करूंगी, और कब रोटी पकाने बैठूंगी ? ख्वामख्वाह, बेफ़िजूल की गुफ़्तगू में बैठा दिया मुझे ?

मजीद मियां – आपाजान ! मैं खर्रास नहीं हूं, केवल वेहम हो गया मुझे..जिससे बात इतनी बढ़ गयी ! मगर सच्च है, के ‘इस रशीद की आंखें कायरी [बिल्लोरी] है, और यह साहबज़ादा है कमाल का ! सबको नचा दिया इसने, जवानी से लेकर बुढ़ापे तक ! आखिर, यह है कमाल का नचंया लौंडा !’

[दोनों के ठहाके गूंज़ने लगे, थोड़ी देर बाद दोनों जाते दिखाई देते हैं ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच वापस रोशन होता है ! गाड़ी का मंज़र, सामने नज़र आता है ! दीनजी भ’सा पूरी दास्तान सुनाकर, अब कहते हैं..]

दीनजी – अब आप सबने सुन ली, पूरी दास्तान ! अब रशीद भाई की कीजिये, छुट्टी ! यों भी अब, इनके पास बाबा का हुक्म आने वाला है ! क्या, आप जानते हैं ? आज इस किस्से के कारण, बाबा का हुक्म आने में काफी देर हो गयी है !

सावंतजी – अरे, कहाँ जा रहा है रे ? [रशीद भाई की तरफ़ देखते हुए] ए रे रशीद भाई, थोड़ी देर धाबड़ दाब ले ! मामू के एक-दो और किस्से, सुनाता जा !

रशीद भाई – [पेट दबाते हुए कहते हैं] – लीजिये सुनिए, बकरा मन्नत का ! फिर इसके बाद सुनना, किस्सा ‘जासूसी कुत्ता’ !

[गाड़ी की रफ़्तार बढ़ती जा रही है, इधर रशीद भाई किस्सा सुनाते जा रहे हैं ! पूरा वाकया चित्रपट के चल-चित्र की तरह, सुनने वालों की आँखों के आगे छा जाता है ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

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