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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



प्यार की माला


डॉ० अनिल चड्डा


 
थोड़ा सा हँस लेते हैं,
थोड़ा सा रो लेते हैं,
यूँ ही चलते-चलते तो,
जीवन को खो देते हैं !

अपने-अपने रस्ते हैं,
अपनी-अपनी मंजिल है, 
सब खो जाते रस्ते में,
अहं की अंधी गलियों में,
छोटी-छोटी खुशियाँ भी,
यूँ ही तो खो देते हैं !!

वक्त जो करवट ले ले तो,
दिन को रात बनाता है,
चाहे जितना ऊंचा हो,
धम से नीचे गिराता है,
दूजों की हालत से हम,
सबक नहीं क्यों लेते हैं!!

आये अकेले, जाना अकेले,
दुनिया तो इक मेला है, 
किसने पाना, किसने खोना,
किस्मत का सब खेला है,
सबके प्यार की माला को,
दिल में क्यों नहीं पिरोते हैं!!
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