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वर्ष: 2, अंक 26, दिसम्बर(प्रथम), 2017



आधा बदन


-डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


 
घर में रहने के निशां, गालों के हैं।
जख्म दिल पर, आपकी चालों के हैं।।

मुझे जो जीवन, गुलामों सा मिला।
ये सभी सरकार, कई सालों के हैं।।

अष्क जो झरते रहे हैं रात दिन।
घाव रिसते ये कई छालों के हैं।।

चूडियां बिछियें, ये कंगन सुनहरे।
ये निषां भी, बदन पर जालों के हैं।।

नकाबें, घूंघट छिपा ये रूख मेरा।
कैदखानों पर जड़े तालों के हैं।।
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